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बहुरुपिया

मै खींचता मुखौटा, वो नया लगाता है, देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है। पहन मुखौटा, नया स्वाँग सजाता है, देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है। हज़ारों गुनाहों का हिसाब छिपाकर, ईमानदारी का वो चेहरा दिखाता है। ख़ुद ही बनाता है क़ानून अपने, फिर दूसरों को उसूल सिखाता है। मै खींचता मुखौटा, वो नया लगा…

रफ्ता रफ्ता ही

रफ्ता रफ्ता ही कोई होशियारी नहीं, होशियार होना, मुश्किल होता है जिम्मेदार बनना। माँ-बाप की आँखों में देखें तो मुश्किल लगता है उनकी परेशानियों का हिस्सेदार बनना। यूँ तो आसान है नादान बनना, मुश्किल है जिम्मेदार बनना। परिस्थितियाँ भी चाहती होंगी जग में एक बदलाव लाना, हमारी इच्छाएँ बाज़ की तर…

अल्फ़ाज़ हैं लेकिन खामोश है

अल्फ़ाज़ हैं लेकिन खामोश है किताब की तरह है उनकी कहानी, अल्फ़ाज़ हैं लेकिन खामोश है। हर पन्ने पर दर्द की स्याही है, मगर हर लफ़्ज़ में सब्र की जोश है। न जाने ज़िंदगी में कितने पन्ने उन्होंने ख़ुद ही सवारे, निखारे हैं, पर आज बाहर चारपाई पर बैठे भीड़ में रहकर भी तन्हा हारे हैं। ख़ैरियत के वा…

हुनर: नये उड़ान की शुरुआत

हुनर: नये उड़ान की शुरुआत तू लड़ उन  आंधियों  से यही हुनर कल काम आएगा सब्र कर परेशान न हो ये इम्तिहान का वक्त है देखना कल का सूरज एक नई किरण के साथ आएगा तू पूछ उस गिरती बारिश से उनका भी तजुर्बा तेरे काम आएगा जिनके द्रव्यमान हल्के न हो फिर भी बादलों में तैर दिखाया है देखना कल ये हुनर नए पंख…

पलायन करते पक्षी

पलायन करते पक्षी जब मेरी लहरों के साथ तेरी स्वर-लहर गूंजती थी भर चारो तरफ खुशहाली सबको मंत्रमुग्ध कर देती थी अब सुनी पड़ गई ये ललचाती लहरे वीरान जगहों में भी तुझे बुलाती है लहरें आकर इस धारा में फिर से सैर करना तू आकर मेरी जल से फिर अपनी प्यास बुझाना तू अब तुम कहा चले गए कमी खलती है तुम्ह…

मन में दुविधा मत रखो

मन में दुविधा मत रखो जो करना है वो करो मन में दुविधा मत रखो हर तुद परिस्थितियों में हसो बस मन में दुविधा मत रखो तुम नवोदय के बीज हो गर मिट्टी में लिपटोगे नहीं तो खिलोगे कैसे  अपनी खुशबूओ से जग में महकोगे कैसे ये खुला नभ तुम्हारा है जो करना है वो करो बस मन में दुविधा मत रखो             - …

थोड़ा बहुत कविता

थोड़ा बहुत हैरान होने की बात नहीं थोड़ा बहुत तो हम भी लिख लिया करते है आदा की गई किसी के वफाओं को हम भी पन्ने पर उतार लिया करते है सुना इश्क़ में ये गवारा नहीं लहज़ा अपनी अल्फाजों में किसी को बदनाम नहीं किया करते कुछ बाते छिपाकर  कुछ बाते को ही बयां करते है हा उस चांद के साथ हम भी निकलते…

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