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किसान पर कविता

लाचार किसान ✍️आजकल परिंदे अपनी जान कहा बचा पाते वे उन परिंदे को अपनी नई पंख लगा के उड़ा देते इमारती दुनिया में कच्ची मकान में रहने वाले मजबूरन परिंदे अपनी ही आशियाना खुद तोड़ देते वे निर्वाचन से पहले पूछते उनके अरमानों को दे सब्सिडी की लालच टैक्सो से ही गर्दन दबोच देते मौसमों के मार, ब…

दरिंदे

दरिंदे भले इंसान के जैसा हूं बहू था पर इंसान नहीं था वासना की कामना धर वे एक हैवान था मोहब्बत के लिबास पहने जिस्म के प्यासा था आबरू को लूटने वे दरिंदे हैवानियत का गुलाम था "फिर एक निर्भया जाग गई है दरिंदगी इंसानियत को शर्मसार कर गई है फिर चारो तरफ होगी शोर,निकलेगे कैंडल मार्च अब तो …

उठ मां

उठ मां ✍️अभी तक क्यों सोई है उठ जा अब सुबह हो गई मां मुझसे तू इतना क्यों इतना रूठ गई तू मुझको छोड़कर नहीं जा सकती है सुन तेरी बच्ची तुझे पुकारती है सुना है मां के रूप भगवान साथ रहते है तुझको मुझसे छीन ले वे इतने निष्ठुर नहीं होते है ये सियासत तो से पड़ा है …

हैवानियत

हैवानियत कुछ पल और कर लो सब्र ✍️अब तो कुछ पल और कर लो सब्र लाशे दफन के लिए खोदे जा रहे कब्र भावनाओं का भी नहीं हो रहें कद्र अब तो जनावर भी नहीं बचा पा रहे गर्भ बेजुबानों का यही हालात दिखते है अब तो ईमान भी रद्दी के भाव बिकते है अपनों से कैसी है ये रंजीदा दिल्ली में उठा है ये मुद्दा लेकिन…

कैसी है महामारी

कैसी है महामारी फासला बढ़ा दी हमारी  (कोरोना में न जाने कितने हमसे दूर चले गए ये कविता घर के छोटे छोटे बच्चे का दादा दादी से दूर होने की व्याकुलता को दर्शाती है) ✍️कैसी है ये महामारी फासला बढ़ा दी हमारी अन्तिम समय भी उनको न देख पाए अपने को भी अलविदा न कह पाए जिनसे मिलने के लिए रहत…

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