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बिखरते पन्ने | आख़िर कौन ज़िम्मेदार है?

बिखरते पन्ने|आख़िर कौन ज़िम्मेदार है?

amarjeet poetry

✍️ ये छिटककर बिखरते पन्ने
क्या अकेले पूरे कर पाएँगे सपने?
कितने रहाल बनेंगे अपने-अपने,
हल्की हवाओं से क्यों दूर जा रहे पन्ने?

क्या दो पन्नों को जोड़ने वाले धागे कमज़ोर हैं,
या सिलने वाला ही कहीं मजबूर है?
क्या उस पाठक का भी कोई कसूर है?
इन किताबों के टुकड़ों पर आख़िर कौन ज़िम्मेदार है?

अब हर पुस्तक की यही कहानी,
गर समय मिले तो इस पर गौर फरमानी।
इन पन्नों का, उन पांडुलिपियों की तरह,
कहीं न बन जाए कोई अनकही कहानी।

डर है कहीं ये पन्ने कचरे के डिब्बे में न चले जाएँ,
बढ़ती माँगों से उस पेड़ के पाँव कब्र में न चले जाएँ।
अब तो फ़ेविकोल का प्रभाव भी बेअसरदार है,
इन किताबों के टुकड़ों पर आख़िर कौन ज़िम्मेदार है?

                                                      -अमरजीत

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