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मेरी जिंदगी | छँटती उम्मीदों का गुलाब

छँटती उम्मीदों का गुलाब मेरी जिंदगी ✍ मेरी ज़िंदगी बन गई है एक गुलाब का फूल , चुभा है मेरा काँटा उस माली को जो तोड़ने आए थे फूल। इस मौसम में मेरी कली नहीं बन पाई, मेरी ज़िंदगी बन गई है एक गुलाब का फूल। अब कैसे बनूँ किसी मंच की सजावट का हार, कैसे बनूँ किसी गुलदस्ते का एक हिस्सा, कैसे बनूँ …

जिंदगी के हर जंग जीत जाएंगे

जिंदगी के हर जंग जीत जाएंगे ✍️रास्ते कितने भी कठिन हो मंजिल चाहे कितने भी आसमां पर हो

कहाँ हो मोहन

कहाँ हो मोहन ✍️कोई खोजे वृदावन मे तो कोई बिरज के गलियो कोई खोजे तुम्हें अपनी ध्यानों में तो कोई प्रेम के डगरो मे तुम कहाँ हो मोहन तुम कहाँ हो कोई खोजे यमुना के तटों पर तो कोई कदम के पेड़ों पे कोई खोजे गायो के झुंडो में तो कोई बाल गोपालो मे कहाँ हो मोहन कहाँ हो               - अमरजीत

बिखरते पन्ने | आख़िर कौन ज़िम्मेदार है?

बिखरते पन्ने| आख़िर कौन ज़िम्मेदार है? ✍️ ये छिटककर बिखरते पन्ने क्या अकेले पूरे कर पाएँगे सपने? कितने रहाल बनेंगे अपने-अपने, हल्की हवाओं से क्यों दूर जा रहे पन्ने? क्या दो पन्नों को जोड़ने वाले धागे कमज़ोर हैं, या सिलने वाला ही कहीं मजबूर है? क्या उस पाठक का भी कोई कसूर है? इन किताबों के…

बिहार में प्रलय

कितने आपदाएं से गुजरेगा  बिहार बिहार ✍️कितने-कितने आपदाएं से गुजरेगा बिहार कभी सुख़ार  तो कभी बाढ़  कभी लू  तो कभी चमकी बुखार  कभी वज्रपात तो कभी आकाल किस तंद्रा या निद्रा में है सरकार कोरोना ने सवाल किया ही अब कर रही है बाढ़ न जाने कहा नेत्र मुद बैठी है सरकार न कोई जनता से सुध ना कोई प्र…

शख्स

शख्स शख़्स ✍️उसकी नवाज़िश में भी कोई साजिश लगती है ये बदलाव में उसकी कोई निजी खाहिश लगती है वरना जब माज़ी में आई थी खिजां तब उसको कोई मदद के लिए नहीं सुझा कर खिदमत अपने कामों कि सिफ़ारिश करता है बारूद तिलियो पर थी बदनाम माचिस को करता है वह शख्स अपने गलतियों पर झूठ के पर्दा …

मा-बाप वृद्धाश्रम | बेटा - ये कैसा फ़र्ज़?

"बेटा - ये कैसा फ़र्ज़?" ✍️बेघर हुए माँ-बाप, जिनके आँचल में जीवन-पथ पर चलना सीखा, आज उसी आँचल पर कलंक क्यों बन गया बेटा? जिन उँगलियों को थाम पहला क़दम रखा था, आज उन्हीं काँपती उँगलियों का सहारा बनने से क्यों कतराता है? जिन कंधों पर बैठ सारा मेला घूम आया, आज वही कंधे उसे बोझ क्यो…

माँ तो माँ ही होती है। Poem on maa in hindi

माँ ✍️जब गूँजी पहली किलकारी घर के आँगन में, सब हँसे थे, लेकिन मैं रो रहा था। क्योंकि उस समय मैं माँ से लिपटकर उसका दर्द महसूस कर रहा था। मुझे देख उसने मुझे अपने पास सुलाकर, अपने मुख पर एक मुस्कान लाई। उसके चेहरे को देख मेरे अंदर से भी मुस्कराहट फूटकर बाहर आई। अपने कई दर्दों को वह हँसक…

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