रफ्ता रफ्ता ही

कोई होशियारी नहीं, होशियार होना,
मुश्किल होता है जिम्मेदार बनना।
माँ-बाप की आँखों में देखें तो
मुश्किल लगता है
उनकी परेशानियों का हिस्सेदार बनना।
यूँ तो आसान है नादान बनना,
मुश्किल है जिम्मेदार बनना।
परिस्थितियाँ भी चाहती होंगी
जग में एक बदलाव लाना,
हमारी इच्छाएँ बाज़ की तरह
ऊँची उड़ान भरना।
पर मुश्किल है
बरसात या सर्दी में
पंखों को फैलाना।
पर ये सच है—
रफ्ता-रफ्ता ही
गुमसुम हवाओं का
तूफ़ान होना।
✍अमरजीत


Bahut badhiya bhai 👌👌👌👌
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