अल्फ़ाज़ हैं लेकिन खामोश है

किताब की तरह है उनकी कहानी,
अल्फ़ाज़ हैं लेकिन खामोश है।
हर पन्ने पर दर्द की स्याही है,
मगर हर लफ़्ज़ में सब्र की जोश है।
न जाने ज़िंदगी में कितने पन्ने
उन्होंने ख़ुद ही सवारे, निखारे हैं,
पर आज बाहर चारपाई पर बैठे
भीड़ में रहकर भी तन्हा हारे हैं।
ख़ैरियत के वास्ते नहीं,
वसीयत के वास्ते होती है ख़िदमत उनकी,
अपनों की ख़ुशी के नाम
लुटा दी उम्र की सारी दौलत उन्होंने।
यही तो सदाक़त है शायद,
जो शोर नहीं, सुकून बन जाती है,
ख़ुद टूटकर भी दूसरों को जोड़ने की
एक खामोश सी इबादत बन जाती है।
आइने को भी मुस्कराहट से
रोज़ गुमराह किए रहते हैं,
दर्द आँखों में समेटकर
हँसना अच्छे से निभाए रखते हैं।
ज़िंदगी कुछ ऐसी किताब है उनकी,
जो हर कोई पढ़ नहीं पाता,
कवर सादा है, अल्फ़ाज़ कम हैं,
पर हर पन्ना रूह तक उतर जाता।
- अमरजीत


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