मै खींचता मुखौटा, वो नया लगाता है,
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।
पहन मुखौटा, नया स्वाँग सजाता है,
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।
हज़ारों गुनाहों का हिसाब छिपाकर,
ईमानदारी का वो चेहरा दिखाता है।
ख़ुद ही बनाता है क़ानून अपने,
फिर दूसरों को उसूल सिखाता है।
मै खींचता मुखौटा, वो नया लगाता है,
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।
कभी संत बनकर उपदेश सुनाता है,
कभी मसीहा बनकर भीड़ जुटाता है।
जो कल तक था ख़ुद कठघरे के भीतर,
आज दूसरों पर उँगली उठाता है।
लफ़्ज़ों में अमृत, इरादों में ज़हर,
मीठी बातों से जाल बिछाता है।
लोगों की सोच पर पहरे बिठाकर,
अपनी मर्ज़ी का सच मनवाता है।
मै खींचता मुखौटा, वो नया लगाता है,
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।
चेहरों की भीड़ में चेहरा पहचानना मुश्किल,
हर शख़्स यहाँ कई किरदार निभाता है।
जो जितना भीतर से ख़ाली होता है,
वो उतना ही ख़ुद को पाक बताता है।
मगर वक़्त के हाथों में आईना भी है,
हर नक़ाब का सच सामने आता है।
चाहे जितने मुखौटे बदल ले बहुरुपिया,
एक दिन असली चेहरा नज़र आता है।
मै खींचता मुखौटा, वो नया लगाता है,
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।।
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।
पहन मुखौटा, नया स्वाँग सजाता है,
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।
हज़ारों गुनाहों का हिसाब छिपाकर,
ईमानदारी का वो चेहरा दिखाता है।
ख़ुद ही बनाता है क़ानून अपने,
फिर दूसरों को उसूल सिखाता है।
मै खींचता मुखौटा, वो नया लगाता है,
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।
कभी संत बनकर उपदेश सुनाता है,
कभी मसीहा बनकर भीड़ जुटाता है।
जो कल तक था ख़ुद कठघरे के भीतर,
आज दूसरों पर उँगली उठाता है।
लफ़्ज़ों में अमृत, इरादों में ज़हर,
मीठी बातों से जाल बिछाता है।
लोगों की सोच पर पहरे बिठाकर,
अपनी मर्ज़ी का सच मनवाता है।
मै खींचता मुखौटा, वो नया लगाता है,
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।
चेहरों की भीड़ में चेहरा पहचानना मुश्किल,
हर शख़्स यहाँ कई किरदार निभाता है।
जो जितना भीतर से ख़ाली होता है,
वो उतना ही ख़ुद को पाक बताता है।
मगर वक़्त के हाथों में आईना भी है,
हर नक़ाब का सच सामने आता है।
चाहे जितने मुखौटे बदल ले बहुरुपिया,
एक दिन असली चेहरा नज़र आता है।
मै खींचता मुखौटा, वो नया लगाता है,
देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है।।
- अमरजीत



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