मै खींचता मुखौटा, वो नया लगाता है, देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है। पहन मुखौटा, नया स्वाँग सजाता है, देखो बहुरुपिया, नया रूप बनाता है। हज़ारों गुनाहों का हिसाब छिपाकर, ईमानदारी का वो चेहरा दिखाता है। ख़ुद ही बनाता है क़ानून अपने, फिर दूसरों को उसूल सिखाता है। मै खींचता मुखौटा, वो नया लगा…