अल्फ़ाज़ हैं लेकिन खामोश है किताब की तरह है उनकी कहानी, अल्फ़ाज़ हैं लेकिन खामोश है। हर पन्ने पर दर्द की स्याही है, मगर हर लफ़्ज़ में सब्र की जोश है। न जाने ज़िंदगी में कितने पन्ने उन्होंने ख़ुद ही सवारे, निखारे हैं, पर आज बाहर चारपाई पर बैठे भीड़ में रहकर भी तन्हा हारे हैं। ख़ैरियत के वा…